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#gulzar — Public Fediverse posts

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  1. किताबें मांगने,
    गिरने, उठाने के बहाने
    रिश्ते बनते थे
    उन का क्या होगा......
    #Gulzar

  2. CW: Hindi/Urdu Poetry by Gulzar

    दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
    जैसे एहसां उतारता है कोई

    दिल में कुछ यूं संभालता हूं ग़म
    जैसे ज़ेवर संभालता है कोई

    आइना देख कर तसल्ली हुई
    हम को इस घर में जानता है कोई

    Din Kuch Aise Guzarta Hai Koi
    Jaise ehsaan Utaarta Hai Koi

    Dil me kuch yun sambhalta hun gham
    Zaise zevar sambhalta hai koi

    Aayina Dekhkar Tassalli Huyi
    Humko Is Ghar Mein Jaanta Hai Koi

    #ghazal #poetry #gulzar @mastodonindians

  3. "इक बार तो यों होगा
    थोड़ा सा सुकूँ होगा
    न दिल में कसक होगी
    न सर पे जुनूँ होगा...."


    ~ गुलज़ार

    #urdu #gulzar #poetry

  4. "तेरी नज़्म से गुज़रते वक़्त खदशा रहता है
    पांव रख रहा हूँ जैसे, गीली लैंडस्केप पर इमरोज़ के तेरी नज़्म से इमेज उभरती है
    ब्रश से रंग टपकने लगता है
    वो अपने कोरे कैनवास पर नज्में लिखता है,
    तुम अपने कागजों पर नज्में पेंट करती हो"

    ~ गुलज़ार

    #AmritaPritam #Gulzar #poetry #nazm

  5. "आओ फिर नज़्म कहें
    फिर किसी दर्द को सहलाकर सुजा ले आँखें
    फिर किसी दुखती हुई रग में छुपा दें नश्तर
    या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर एक बार
    नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दें लें

    फिर कोई नज़्म कहें...."

    ~ गुलज़ार

    #poetry #nazm #gulzar #urdu #Rekhta

  6. कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
    कभी गोदी में लेते थे
    कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
    नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
    वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
    मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
    और महके हुए रुक्के
    किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
    उनका क्या होगा
    वो शायद अब नही होंगे!!

    ~ गुलज़ार

    3/3

    #books #gulzar #poetry #reading #kitaaben #urdu #nazm

  7. कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
    कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
    बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
    जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
    जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
    अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
    किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है

    2/3

    #books #gulzar #poetry #reading #kitaaben #urdu #nazm

  8. किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
    बड़ी हसरत से तकती हैं
    महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
    जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
    अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
    बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
    उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
    जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
    जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं

    1/3

    #books #gulzar #poetry #reading #kitaaben #urdu #nazm

  9. To the people who love books and reading them. Here is a nazm for you. One of the best by Gulzar Sahab!

    youtu.be/tEBHmsx2Pjw

    #books #gulzar #poetry #reading #kitaaben #urdu #nazm

  10. "इतना लंबा कश लो यारो, दम निकल जाए
    ज़िन्दगी सुलगाओ यारों, ग़म निकल जाए

    दिल में कुछ जलता है, शायद धुआँ धुआँ सा लगता है
    आँख में कुछ चुभता है, शायद सपना कोई सुलगता है
    दिल फूँको और इतना फूँको, दर्द निकल जाए
    ज़िन्दगी सुलगाओ यारों, ग़म निकल जाए

    तेरे साथ गुजारी रातें, गरम गरम सी लगती हैं
    सब रातें रेशम की नहीं पर, नरम नरम सी लगती हैं
    रात ज़रा करवट बदले तो, पर निकल जाए
    ज़िन्दगी सुलगाओ यारों, ग़म निकल जाए"

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #poetry #zindagi #life #nazm #urdu #rekhta

  11. मुंबई

    "रात जब मुंबई की सड़कों पर
    अपने पंजों को पेट में लेकर
    काली बिल्ली की तरह सोती है
    अपनी पलकें नहीं गिराती कभी,
    साँस की लंबी लंबी बौछारें
    उड़ती रहती हैं खुश्क साहिल पर!"

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #mumbai #poetry #nazm #urdu #rekhta

  12. लिबास

    मेरे कपड़ों में टंगा है
    तेरा ख़ुश-रंग लिबास!
    घर पे धोता हूँ हर बार उसे और सुखा के फिर से
    अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूँ मगर
    इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उस की
    और धोने से गिले-शिकवों के चिकते नहीं मिटते!
    ज़िंदगी किस क़दर आसाँ होती
    रिश्ते गर होते लिबास
    और बदल लेते क़मीज़ों की तरह!

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #poetry #nazm #urdu #rekhta

  13. "आदमी बुलबुला है पानी का
    और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
    फिर उभरता है, फिर से बहता है,
    न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख़ तोड़ पाई है,
    वक्त की मौज पर सदा बहता आदमी बुलबुला है पानी का।"

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #poetry #nazm #urdu #rekhta

  14. "देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
    देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
    ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
    काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
    ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
    जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा"

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #poetry #nazm #urdu #rekhta

  15. "वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
    आदत इस की भी आदमी सी है"

    ~गुलज़ार

    #Gulzar #poetry #shayari #urdu #life #rekhta

  16. Here is to all the failures, disappointments, frustrations, worries and apprehensions. Here is to life. Here is to all of us.

    #Gulzar #poetry #life

  17. @majchowdhury @Gulrayys @dushyant

    रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
    काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
    रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
    और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
    रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

    ~गुलज़ार

    2/2

    #poetry #Gulzar #adda #nazm #love

  18. @majchowdhury @Gulrayys @dushyant

    रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
    काट के दाल दिया जलाते अलावों मसं उसे
    रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
    और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
    रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

    ~गुलज़ार

    2/2

    #poetry #Gulzar #adda #nazm #love

  19. @majchowdhury @Gulrayys @dushyant

    This reminds me of a beautiful nazm of Gulzar Sahab

    रात भर सर्द हवा चलती रही
    रात भर हमने अलाव तापा
    मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
    तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
    मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
    तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
    अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
    और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
    तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी|

    1/2

    #poetry #Gulzar #adda #nazm

  20. @majchowdhury @Gulrayys @dushyant

    This reminds me of a beautiful nazm of Gulzar Sahab

    रात भर सर्द हवा चलती रही
    रात भर हमने अलाव तापा
    मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
    तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
    मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
    तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
    अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
    और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
    तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी|

    1/2

    #poetry #Gulzar #adda #nazm

  21. थोड़ा सुकून भी ढूँढिये जनाब,
    ये ज़रूरतें तो कभी ख़त्म नहीं होंगी ।"

    ~गुलज़ार

    The photo in the background is of the mountains in #Sikkim, enroute Nathula.

    #urdu #shayari #poetry #Gulzar #adda