किसी भी क़िस्म की ज़ोर-ज़बरदस्ती
इस इंसानी रिश्ते को तोड़ देती है।
फिर जो रिश्ता वुजूद में आता है,
वह बस एक हैवानी रिश्ता होता है।
उस रिश्ते में कोई भलाई नहीं होती।
जिसकी लाठी, उसकी भैंस हो जाती है—
जैसे जंगल में एक ताक़तवर जानवर
अपने से कमज़ोर को खा जाता है।
क्या ऐसे जंगल में वह इंसान भी
अपनी फ़िक्र के साथ सही-सलामत ज़िंदा बच पाएगा,
जो तानाशाही को जायज़ ठहराता है?
(2)
~अरशद
7 अक्टूबर 2026